Saturday, 9 April 2016

कोसी

राधा के बगल में आ कर बैठने से रौनक चौंक उठा । बहुत देर से वो कोसी नदी के किनारे बैठ पानी का शोर सुन रहा था । कभी मुस्कुराता तो कभी रोता, जाने वो नदी से क्या बातें कर रहा था । वो बार बार बहते पानी से अपने पैरों को धोने की कोशिश कर रहा था, पर नदी का बहाव इतना तेज़ था के हर बार रौनक को हार मन्नी पड़ रही थी । पर अचानक राधा के आ जाने से वो सजग हो गया, ये सोच कर के उसकी पत्नी जिसके आये हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ उसे बच्चों जैसी हरकते करता देख क्या सोचेगी । पर उसे समझ नहीं आ रहा था के राधा यहाँ कैसे आ गयी । इस जगह का तो उसने कभी ज़िक्र नहीं किया, फिर कैसे?
फिर उसे याद आया के वो अपनी डायरी तो गाड़ी में ही भूल आया था । पर राधा को बुरा न लगे इसलिए उसने कुछ भी पूछना ठीक नहीं समझा ।

रात का सन्नाटा इतना सुकून भरा था के रौनक और राधा चुप चाप तारों को निहार रहे थे । किसी को कहीं जाने की जल्दी नहीं थे, एकदूसरे को देने के लिए पूरी दुनिया का वक़्त था । राधा ने ही चुप्पी तोड़ी:

"आपको ये जगह बहुत पसंद है न? अपनी डायरी में आपने इस जगह का बार बार ज़िक्र किया है । माफ़ कीजियेगा पर मैंने आपकी डायरी पढ़ी, पर पूरी नहीं, टुकड़ों में । बस इतनी के इस जगह का पता चल सके । "

" कोई बात नहीं राधा । तुम न भी पढ़ती तो भी मैं तुम्हे सब बता देता । वैसे हाँ, इस जगह से मुझे काफी लगाव है । पसंद है या नहीं ये नहीं कह सकता । बचपन में यहीं खेलने आया करता था । मेरे घर के ठीक पीछे है ये जगह, इसलिए देर होने पर भी कोई डांटता नहीं था । मैं घंटों यहाँ बैठा करता था । पहले यहाँ बरगद का एक पेड़ भी हुआ करता था, बरहम बाबा कहते थे उन्हें । यहाँ मैं और मेरे दोस्त डोला पाती खेलते थे ।"

"ये कौन सा खेल है? "

" इसकी टहनियों पर हम दौड़ लगाते थे । कई बार गिरने से हाथ पैर में चोट भी लगी है । जब मैं रोने लगता था तो बाबूजी कहते थे के ये तो कुछ भी नहीं है, जब वो छोटे थे तो उनका हाथ टूट गया था । ये सुन कर बहुत बुरा लगत था, के मेरा हाथ क्यों नहीं टुटा । ज़रूर मैं ठीक से नहीं खेलता ।"

"और क्या यादें हैं?"

"इसी पेड़ की पूजा करने सारे गाँव से व्रतियां आती थी । नदी के पानी में पैर धोने से उनके आलते का रंग सीढ़ियों पर भी लग जाता था । फिर धीरे धीरे वो रंग सरकता हुआ कोसी में मिल जाता था, और देखते ही देखते गायब ! ये सब कुछ मुझे बहुत ही रोमांचित करता था। खेलना, तारे गिनना और व्रतियों को पूजा करते हुए देखना ।"

"इतनी सारी अच्छी यादें फिर भी बस लगाव है?"

"हाँ, बस लगाव है । पसंद नहीं ।"

"अजीब बात है! नापसंद करने वाली कौन सी बात है?"

"है बस"

"क्यों? मैं जानना चाहती हूँ"

" क्योंकि कोसी में जब बाढ़ आई थी तो सबसे पहले मेरा घर डूबा था । हमने दो दिन पहले ही घर छोड़ दिया था। कोसी बेलगाम हो चुकी थी, अपने पराये का भेद भूल चुकी थी । जिन खेतों को उसने सींचा था उन्ही खेतों को बर्बाद करने पर आतुर थी। मैं महज़ बारह साल का था । अपनों की आँखों में वो खौफ आज भी याद है मुझे । उस दिन के बाद हम कभी गाँव नहीं आये । बाबूजी ने शहर में ही किराए पर मकान ले लिया और मुझे पढाने लगे। उस बाढ़ ने मुझे आगे पढ़ने की प्रेरणा दी, या सच कहूं तो डराए रखा । उसी बाढ़ की वजह से तो मैं डैम इंजीनियर बना ।"

" पर इतना कुछ होने के बाद भी आप कोसी के लिए नहीं बदले "

"कैसे बदलूँ ? ज़रा देखो तो इसे, ये भी तो वैसी ही है - अल्हड़ , चंचल , मदमस्त, किसी के हाँथ ना आने वाली - कोसी ।"





Sunday, 3 April 2016

इश्क़ में शहर होना

जाने क्यों आज फ्लाईओवर से उतरते हुए बीता वक़्त याद  आ गया
के इसकी मरम्मति का ही वक़्त था
जब मैं तुमसे पहली बार मिली थी
उन बेतरतीब रास्तों पर चली, कीचड़ में सनी,
उस बारिश में मैं कितनी बार छीँकि थी 


अपनी दोस्ती के उस दौर में
हम कितना चला करते थे
एकांत भरी एक जगह के लिए
कितना वक़्त ज़ाया करते थे 


फिर गंगा घाट पे शामों को
जो चाए पिया करते थे
गांधी सेतु की जामों को
हम अंत तक जिया करते थे 


गांधी घाट के उस नाविक ने
जब हमें गंगा पार कराया था
गंगा नदी में सूरज को डूबता देख
जो सुकून हमने पाया था 


अशोक का इतिहास मुझे
तब ही याद हो पाया था
अगम कुआँ में झांकते वक़्त
जब तुमने मुझे गिरने से बचाया था 


हाई कोर्ट की ईमारत तुम्हे 
इतनी पसंद आती थी 
के विक्टोरिया आर्किटेक्चर के तुम्हारे किस्सों में
घड़ियाँ गुज़र जाती थीं 


बसंत विहार के डोसे की खुशबू
मेरे ज़हन में इस तरह उतर जाएगी
के आज भी डोसे के नाम से मुझे
तुम्हारी हिचकियाँ याद आएँगी 


बोरिंग रोड का वो कैफे
जहाँ हम दिन भर बैठा करते थे
जमुना अपर्टमेंट को देख कभी
अपने घर के सपने बुना करते थे 


उस वक़्त मैंने सोचा ही नहीं
कि एक दूसरे के प्यार में 

हम ऐसे कैद हो जायेंगे
के शहर के हर कोने को खुशियों से भर जायेंगे 

और उन्ही लम्हों को दोहराने में
इतने मग्न हो जायेंगे के 

प्यार में चलते चलते जाने कब 
इश्क़ में शहर हो जायेंगे 


Saturday, 27 February 2016

एक संडे की आत्मकथा

पता नहीं क्यों किसी किसी दिन वहीँ जाने का मन करता है जहाँ से आये थे । आज सुबह भी ऐसा ही हुआ । आँख खुलते ही जी चाहा की उस  दौर में पहुंच जाएँ जब संडे का मतलब 8 बजे तक सोना और देर से नाश्ता करना होता था । स्कूल से एक दिन कि छुट्टी गिफ्ट की तरह लगती थी। जब माँ के हाथ का बना संडे स्पेशल हम सब एक साथ कहते थे ।
संडे की दोपहर भी अजीब सी होती थी, हर दिन से अलग फिर भी एक सी । दोपहर को खाने के बाद सोना और जल्दी से शाम होने का इंतज़ार करना । फिर उन शामों को किसी के नाम कर देना या खुद किसी की शाम का हिस्सा बन जाना । कितना अच्छा लगता था जब ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल सारे लोग फुर्सत के पल निकल कर एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते थे ।
उसी साथ को साकार करने के लिए तो होता था शाम का नाश्ता ! संडे के दिन ही तो मैं और भाई मैगी से नाता तोड़ कर चाट और मोमोज़ से रिश्ता जोड़ते थे । भाई को मेरे हाथ की कोल्ड कॉफ़ी और मैकरोनी कितनी पसंद थी !

वो संडे ही तो होता था जब मैं और मिनी शाम के 5 बजने का बेसब्री से इंतज़ार करते थे । श्रीराम कुञ्ज की वो छत, उस छत का वो कोना जहाँ देर तक टहलने के बाद हम सुस्ताने के लिए बैठा करते थे और आस- पास के घरों तक पहुंचती हमारी तेज़ डरने वाली हँसी । उन शामों में होने वाली मेरी और मिनी की दुनियादारी की बातें और एक दूसरे को प्यार जताने के लिए बोले गए गालियों भरे वो शब्द ।
उसके बाद कितनी ही शामें दोस्तों के साथ टहलते हुए गुज़री हैं - पर न मिनी जैसा कोई साथी मिला न श्रीराम कुञ्ज की वो छत मिली । शायद मैंने ढूंढा भी नहीं या फिर मैं ढूंढना चाहती भी नहीं हूँ ।

बहुत कुछ बदल गया है मेरी ज़िन्दगी में । माँ के नाश्ते की जगह मेस का खाना है। पापा की डाँट की जगह प्रेजेंटेशन की तलवार है और बेपरवाह शामों की जगह लाइब्रेरी में गुज़ारा वक़्त है ।
और संडे? अब संडे और मंडे में तो कोई फर्क ही नहीं रहा ।
हो सकता है आज से 5 साल बाद मैं लाइब्रेरी को उसी तरह मिस करूँ जिस तरह श्रीराम कुञ्ज की छत को कर रही हूँ ।

पर ऐसा ही होता है शायद । अपनी ज़िन्दगी को आसान करने के लिए बदलती ज़िन्दगी के साथ लड़ने की जगह ज़िन्दगी के साथ बदल जाना ही आसान तरीका है । 

इज़हार

उस वक़्त मैंने कहाँ सोचा था की अनजाने में तुम्हारे साथ बिताया ये वक़्त , बेमन तुमसे की हुई ये बातें मुझे तुम्हारे करीब लाने का किस्मत का बहाना  है ।
मैंने कब जाना की राह चलते अचानक तुमसे टकरा जाना और उसके बाद घंटो तुमसे की हुई बातें इतनी कीमती हो जाएँगी की हर बार, बार बार, तुम्हारे और करीब होने के लिए मैं दिन में हज़ार बार उन्हें दोहराती रहूंगी ।
मुझे तो पता भी नहीं चला की कब तुम्हारे साथ वक़्त बिताने की ये आदत मेरी चाहत बन गयी ।

जाने कौन सी बात है तुममे की तुमसे दूर रहना मुझे बेचैन कर देता है । फिर जाने वो कौन सी बात है की तुम्हारे पास होकर भी मुझे चैन नहीं मिलता ।
मैं कायल हूँ तुम्हारी इस हँसी की । किसी बात पर तुम्हे दिल खोलकर हस्ते हुए देखना कितना सुखद एहसास है । दिल जीत लेने वाली तुम्हारी वो निश्छल, मंद मुस्कान तुम्हे और खूबसूरत बनती है ।

मैं परेशान हो जाती हूँ तुम्हरी सबको परेशान करने की आदत से । कई बार तुम्हारे कान खींचने का दिल करता है, की तुममे क्यों अभी भी बचपना है? तुम कब बड़े होगे ? पर सच कहूँ तो तुम्हारा ये बचपना भी मुझे पसंद है । मुझे परेशान देखकर तुम्हारा खुश होना भी मुझे ख़ुशी देता है ।

मैं जानती हूँ मैं तुमसे ये सब कह नहीं पाऊँगी । नाही तुम कभी समझ पाओगे । शायद प्यार में मिली हार ने मुझे कमज़ोर कर दिया है । मुझे डर लगता है तुम्हारे लिए अपने इन जज़्बातों से । मैं तुम्हारे लिए अपनी चाहत को और बढ़ने नहीं देना चाहती ।

किसी को यादों से निकाल पाना बहुत ही मुश्किल होता है । और खुद को एक बार फिर समेटने की हिम्मत नहीं है मुझमें । मैं तुम्हें ये कभी नहीं बताउंगी की तुमने चंद दिनों में मुझे कितनी यादें दी हैं । नहीं बताउंगी की तुम्हारी गैर-मौजूदगी मुझे किस हद तक परेशान कर देती है । तुम्हारा उदास चेहरा मुझे अंदर तक रुला देता है । तुम्हे हस्ता देखने के लिए मैं क्या कुछ कर सकती हूँ ।

तुम्हें कभी नहीं बताउंगी की मैं तुमसे किस कदर प्यार करती हूँ । मुझे टूट कर बिखर जाने से डर लगता है । 

Saturday, 13 February 2016

ग़ुलाब

"आज इतने सारे गुलाब क्यों ?"
"अरे शर्मा जी अपनी वाइफ के लिए ले रहे थे । तो मैंने भी ले लिए । वैसे आज कुछ है क्या?
"हाँ, आज वैलेंटाइन्स डे है । "
"अरे वाह, बहुत अपडेटेड रहने लगी हो आजकल"
"वो सब छोड़िये, कितने के लिए फूल पहले ये बताइये"
"क्यों? आज भी मुझसे लड़ोगी की मेहेंगे ले आया? "
"उसमे नयी बात क्या है? 25 साल हो गए साथ रहते पर आपको बार्गेनिंग नहीं आई । "
"या खुद हर बार की तरह गिफ्ट लेना भूल गयी इसलिए बात बदल रही हो ?"
"बताइये न कितने के लिए?"
"15 रूपए का एक । लो हार गया मैं, अब खुश?"
"ये कैसे ! मैं तो 30 रूपए का एक लेकर आई  ?"
"क्या? हाहाहा !!"
"हँस क्यों रहे हैं आप? मैं हार गयी इसलिए?"
"नहीं बेवकूफ, मैं हार गया इसलिए"

Thursday, 11 February 2016

तुम

"आज मौसम कितना उदास है ना?"
"नहीं तो । बल्कि आज तो मौसम और अच्छा है । देखो न कितनी अच्छी हवा चल रही है"
"नहीं । मुझे वसंत ऋतू बिलकुल भी पसंद नहीं है । कितनी उदास होती है इसकी दोपहर ।" 
"अच्छा? और शामों का क्या?"
"अरे हाँ! शामें तो और अकेली लगती हैं "
"और जो फूल खिलते हैं वो? कह दो की वो भी नहीं पसंद ।" 
"नहीं पसंद"
"और ये जो गिलहरी फुदक रही है वो?"
"नहीं "
"पत्तों के सरसराने की आवाज़?" 
"बिलकुल भी नहीं "
"तब तो तुम्हें चिड़ियों की आवाज़ भी नहीं पसंद होगी" 
"सही समझा । नहीं पसंद "
"यार तुम कैसे इंसान हो?"
"सडु"
"कोई एक चीज़ है जो तुम्हें बहुत पसंद हो ?"
"है न"
"क्या ?"
"तुम हो न "

आखिरी ख़त

आज भी नींद खुलते ही सबसे पहला ख्याल तुम्हारा आता है । पता नहीं तुम समय पर जगे होगे या नहीं । तुम्हे रोज़ सुबह नींद से जगाना तो मेरा काम था । तुम्हे कॉल करने के लिए मैं खुद अलार्म लगा कर सोया करती थी । आज भी याद है मुझे, तुम कैसे नींद में कुछ भी बोला करते थे और मैं मन ही मन तुम्हारी बच्चों जैसी इस हरकत पर मुस्कुराया करती थी । कैसे मैं बार बार अपना फ़ोन देखा करती थी, के शायद तुम काम से आ गए होगे, शायद तुमने कॉल किया होगा । और कभी जो तुम्हारी कॉल मिस हो जाती थी तो खुद को कितना कोसती थी, कि क्या पता अब तुम्हे मुझसे बात करने की फुर्सत मिलेगी भी या नहीं । कहीं फिर आज तुम दोस्तों के साथ खेलने चले गए तो मुझे नींद कैसे आएगी । तुम्हे पता तो है की तुम्हारी आवाज़ सुने बिना मुझे नींद नहीं आती थी ।

तुम्हे याद है तुम कभी कभी फ़ोन पर मुझे हिस्ट्री पढ़ाया करते थे? कभी मुग़ल साम्राज्य तो कभी फंडामेंटल राइट्स, तुम्हे हिस्ट्री में कितनी दिलचस्पी थी न । मुझे हर घटना कहानी की तरह सुनाना और अंत में मुझसे कहानी का सारांश पूछना ! तुम्हारी कहानियाँ और आवाज़ सुनते सुनते कब मुझे इतिहास पसंद आने लगा पता ही नहीं चला ।

ये बारिश आज भी मुझे हमारी पहली मुलाकात की याद दिलाती है । जब तुम परेशान होकर इधर उधर मुझे ढूंढ रहे थे उस वक़्त तुम्हे अपने और करीब आते देख मेरी साँसें तेज़ हो गयी थीं । याद है तुमने मुझे गिरने से बचाया भी था ? मैंने कब जाना की तुम्हारी हर बार मुझे गिरने से बचाने की आदत मुझे लापरवाह बना देगी ।
तुम्हारी इन्ही आदतों की वजह से शायद मैं तुमसे ज़्यादा उम्मीद करने लगी थी । लगने लगा था की तुम बिना बोले मेरी दिल की बातें समझ जाओगे । तुम समझते भी थे । तभी तो मैं तुम्हारे बिना रहने का सोच भी नहीं पाती थी । तब कहाँ पता था की मेरी सोच और मेरी हकीकत  में मीलों का फैसला होगा ।

लोग कहते हैं तुमने कभी मुझसे प्यार नहीं किया । पर पता नहीं क्यों मेरा दिल ये नहीं मानता । मैं खुद को न जाने कैसे कैसे बहाने दे कर मना लेती हूँ की प्यार तो तुम भी करते थे मुझसे । तुम्हारे साथ बिताया हर पल याद है मुझे । तुम्हारा हर पल मुझे अपनी नज़रो के सामने रखना, मुझसे न हटने वाली तुम्हारी गहरी बोलती नज़रें और मुझपर जान छिड़कने वाला तुम्हारा हर वो अंदाज़ । ये सब झूठ नहीं था । मैं चाह कर भी अपने लिए तुम्हारे एहसासों को झूठा नहीं बता सकती ।

तो क्या कारण है की आज हम साथ नही हैं ?
मैंने इस सवाल का जवाब ढूँढना बंद कर दिया है । ज़रुरु मेरी ही कोई गलती रही होगी ।

Tuesday, 9 February 2016

पहला प्यार

ट्रैफिक जैम की वजह से रोहित परेशान होने लगा था । बारिश ने रास्ता और ख़राब कर दिया था । महीनो तक फेसबुक पर एक दूसरे को जानने के बाद आज पहली बार रोहित और रिया मिलने वाले थे । शायद उनकी मुलाकात और रूमानी बनाने के लिए ही आज बिन मौसम बरसात हो रही थी । उन दोनों ने वैसे तो 11 बजे मिलना तय किया था पर मौसम और ट्रैफिक ने समय पर मिलना मुश्किल कर दिया था । ऊपर से रोहित का काम जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।
इधर रिया अपने दोस्तों को ये बताने से बच रही थी के वो अचानक इतनी बारिश में क्लास छोड़ कर कहा जाना चाहती है । पर उसके चेहरे की हँसी उसके बनाये बहाने के साथ 'फिट' नहीं हो रही थी । बहुत देर तक अपने दोस्तों के सवालों से बचने के बाद उसने आखिर बता ही दिया के वो आज रोहित से मिलने जा रही है । पर अब उससे इंतज़ार नहीं हो रहा था । 11 से 1 बज गए थे और अभी तक रोहित का कोई मैसेज नहीं आया था । उसका ध्यान पढाई से कब का जा चूका था । क्लास की आखिरी बेंच पर बैठ कर वो कभी अपना फ़ोन, तो कभी तेज़ होती बारिश देख रही थी ।
रोहित जल्दी से जल्दी अपना काम ख़त्म कर के रिया के कॉलेज जाने के लिए ऑटो में बैठ गया । ट्रैफिक और बारिश ने रोहित का मूड ख़राब कर दिया था । उसे महसूस हो रहा था की आने वाला दिन भी बुरा ही होगा, उसे लगने लगा था की अगर आज वो रिया से मिला तो कुछ भी वैसा नहीं होगा जैसा उसने सोचा था । शायद इतनी देर तक कोशिश करने के बाद भी अपना काम ख़त्म न कर पाने की खिज ने उसे सुस्त कर दिया था । अचानक उसे अपना रिया से मिलने का फैसला भी गलत लगने लगा था । क्या पता उसने रिया के बारे में जैसा सोचा था वो वैसी होगी भी या नहीं । बात करने से तो सीधी और सुलझी हुई लगती है पर ऐसा ज़रूरी तो नहीं की असलियत भी वैसी ही हो । फिर उसने उसे आज तक देखा भी तो नहीं था । न कोई मुलाकात और ना हीं कोई तस्वीर । क्या होगा अगर इस बार भी दिल ने उसे धोखा दिया , अगर इस बार भी हकीकत उसके ख्वाबों की तरह हसीं न हुई । रोहित ने तय कर लिया था की वो रिया को मैसेज कर के नहीं बुलाएगा । वैसे भी बारिश अभी तक रुकी नहीं थी और तय समय कब का बीत चूका था । उसे यकीन था की रिया अब तक घर जा चुकी होगी ।
रोहित का ऑटो रिया के कॉलेज के पास पहुंच चुका था । रोहित ने बाहर की तरफ देखा पर उसे कोई नहीं दिखा । शायद सब जा चुके थे। शाम भी तो हो चुकी थी ।  वैसे तो उसे यकीन था कि रिया जा चुकी होगी पर फिर भी उसका दिल ये उम्मीद कर रहा था की काश उसकी एक झलक देख पता । अचानक उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी जो कॉलेज की बगल वाली गली के सामने खड़ी थी । उसने हरे रंग का सूट पहन रखा था, बाल खुले थे और हाथ में बड़ा सा बैग था । बारिश में पूरी तरह भीगी हुई जाने वो किसका इंतज़ार कर रही थी । रोहित का दिल तेज़ धड़कने लगा, उसने ऑटो को रुकने को कहा और जल्दी से उसे पैसे दिये। पर उसे अभी तक यकीन नहीं था की ये लड़की रिया ही है । वो जल्दी जल्दी रोड क्रॉस करने लगा । पर ट्रैफिक की वजह से इतनी छोटी सी सड़क भी आज इतनी चौड़ी लग रही थी । जैसे जैसे वो उस लड़की के नज़दीक आ रहा था वैसे वैसे उसकी खूबसूरती से रूबरू होता जा रहा था । उसे और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । बस वो और वो लड़की ।
अब रोहित सड़क के इस पार था । उस लड़की के पास जाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी । ऊपर से उसे पता भी तो नहीं था की ये लड़की रिया है या कोई और । कुछ देर तक उस लड़की को बेचैन होता देखने के बाद उसने रिया को कॉल करने का सोचा । शायद ये दूसरी बार ही होगा जब रोहित रिया को कॉल करने वाला था । उसने जल्दी से फ़ोन में रिया का नाम ढूंढा और कॉल बटन दबाया । रिंग जाने की आवाज़ सुन कर रोहित की साँसे और तेज़ हो गयी । उसने उस भीड़ वाली सड़क पर बचते बचते, इतने सरे लोगों के बीच उस लड़की को देखा ।
और उसे देखते ही दिल खो बैठा । पल भर में सब कुछ शांत हो गया, जैसे आस पास सब ठहर गया हो । कदम थम गए, साँसे जम गयी और दिल... उसका तो पता नहीं । दिल अब अपने पास कहाँ बचा था । 
वो पहली बार सपनो को हकीकत में बदलते देख रहा था । 

Wednesday, 6 January 2016

छूटता बंधन

"पता नहीं इस बार कश्मीरी आया होगा या नहीं । माँ ने अपनी शॉल तो मुझे दे दी थी । कितनी ज़िद्द कर के मैंने उन्हें ये शाल दिलाई थी । वो तो पापा से खुद बोलेंगी नहीं । भाई भी तो इतना लापरवाह है । खुद की सुध नहीं रहती उसे, माँ पापा का कैसे ख्याल रखता होगा"

कभी कभी सोचती हूँ तो यकीन नहीं होता के ये मैं ही हूँ, जो पिछले साल तक  सर्दियों में खुद ही बिना स्वेटर के घुमा करती थी -

"माँ तुम जानती हो मुझे उतनी ठण्ड नहीं लगती"

"माँ मैं उस स्वेटर में में बहुत बुरी दिखती हूँ, मैं ये नहीं पहनूंगी"

और अब अपने साथ साथ अपने घर वालों की भी ज़िम्मेदारी - जो किसी ने मुझे दी नहीं है पर बिना जताए मैं मेहसूस ज़रूर करने लगी हूँ ।

मुझे याद है जब मैं कॉलेज से घर पहुँचती थी और माँ घर पर नहीं होती थी तो कितना सुना लगता था । मैं हर जगह माँ को ढूँढ आती थी - छत पर, बालकनी  में,आस-पड़ोस में और दुकान पर भी । एक दिन मैंने माँ को साफ़ साफ़ कह दिया कि मेरे घर से निकलते और लौटते वक़्त तुम घर में रहोगी । पर ये नहीं कह पायी कि घर आने पर तुम नहीं दिखती तो बेचैनी होती है । तुम जाते वक़्त समय पर घर आने की हिदायत नहीं देती तो अधूरा लगता है ।

माँ की हिदायत का असर इतना होता था कि ज़रूरी काम होने पर और देर से आने की इजाज़त होने पर भी घर जाने की जल्दी रहती थी । माँ मुझे दरवाज़े पर देख कर कितना खुश होती थी । मैं जब भी माँ से पूछती हूँ की आप मेरे लिए ही इतनी परेशान क्यों होती हो तो जवाब बस इतना आता है की जब तुम्हारी बेटी होगी तब पता चलेगा !

पापा की एक बहुत बुरी आदत है जो मुझे बहुत अच्छी लगती है - वो है रोज़ सुबह मुझे उठाने की । हर रोज़ मेरी  नींद खुलती थी पापा के शोर करने से । सुबह के 7 बजे पापा चिल्ला रहे होते थे के आजकल के बच्चों का क्या रूटीन है, 12 बजे सोना है और12 बजे जागना है । और मेरे एक बार पापा बोलते ही पापा चुप हो जाते थे । इस बात पर माँ और भाई खूब हस्ते भी थे - के आपको बस आपकी बेटी ठीक कर सकती है । मैं भी ये सुनकर नींद में ही मुस्कुराने लगती थी । आज भी नींद खुलती है पापा के कॉल से । फ़ोन उठाते ही उनकी प्यारी सी आवाज़ में उठ जा बेटू सुनकर मेरी सुबह और सुहानी हो जाती है । पापा की इतनी छोटी छोटी दिल छू लेने वाली आदतें ही उन्हें और प्यारा इंसान बनती हैं । काश मैं उनकी तरह बन पाती !

पहली बार घर से बाहर आने का एहसास ऐसा ही होता होगा । आप छोटी छोटी गैरज़रूरी बातों और चीज़ों से भी रिश्ता जोड़ने लगते होंगे , हर बात में अपने वजूद को तलाशते होंगे और हर नए रिश्ते को अपनेपन के तराज़ू पर तौलते होंगे ।

सबकी ज़िन्दगी में ऐसा ही होता है शायद । अचानक जो रिश्ते आपके दिल के सबसे करीब होते हैं वो आपसे दूर जाने लगते हैं । दूरियों की वजह से रिश्ते और मज़बूत तो हो जाते हैं पर वो बंधन कमज़ोर होने लगता है । पहली बार आपको अपनों की ज़िम्मेदारी का एहसास तो होता है पर आप जानते हैं की एक सीमा से ज़्यादा आप अपनी ज़िम्मेदारी निभा नहीं सकते । यही वो वक़्त होता है जब आपके अनुभव बस आपके होते हैं - कोई साथी कोई संगी नहीं होता उन्हें साझा करने के लिए । शायद यही वो वक़्त होता है जब हम असल मायने में बड़े हो रहे होते हैं ।

बदलते दौर, बदलते वक़्त और बदलते लोगों बीच आप खुद को बदलने और न बदलने के सवाल से रूबरू होते हैं - पर जवाब देना तब आसान हो जाता है जब आपके पास कुछ कभी न बदलने वाली चीज़ों का साथ हो - जैसे पापा की कॉल और माँ की हिदायत ।