Sunday, 3 April 2016

इश्क़ में शहर होना

जाने क्यों आज फ्लाईओवर से उतरते हुए बीता वक़्त याद  आ गया
के इसकी मरम्मति का ही वक़्त था
जब मैं तुमसे पहली बार मिली थी
उन बेतरतीब रास्तों पर चली, कीचड़ में सनी,
उस बारिश में मैं कितनी बार छीँकि थी 


अपनी दोस्ती के उस दौर में
हम कितना चला करते थे
एकांत भरी एक जगह के लिए
कितना वक़्त ज़ाया करते थे 


फिर गंगा घाट पे शामों को
जो चाए पिया करते थे
गांधी सेतु की जामों को
हम अंत तक जिया करते थे 


गांधी घाट के उस नाविक ने
जब हमें गंगा पार कराया था
गंगा नदी में सूरज को डूबता देख
जो सुकून हमने पाया था 


अशोक का इतिहास मुझे
तब ही याद हो पाया था
अगम कुआँ में झांकते वक़्त
जब तुमने मुझे गिरने से बचाया था 


हाई कोर्ट की ईमारत तुम्हे 
इतनी पसंद आती थी 
के विक्टोरिया आर्किटेक्चर के तुम्हारे किस्सों में
घड़ियाँ गुज़र जाती थीं 


बसंत विहार के डोसे की खुशबू
मेरे ज़हन में इस तरह उतर जाएगी
के आज भी डोसे के नाम से मुझे
तुम्हारी हिचकियाँ याद आएँगी 


बोरिंग रोड का वो कैफे
जहाँ हम दिन भर बैठा करते थे
जमुना अपर्टमेंट को देख कभी
अपने घर के सपने बुना करते थे 


उस वक़्त मैंने सोचा ही नहीं
कि एक दूसरे के प्यार में 

हम ऐसे कैद हो जायेंगे
के शहर के हर कोने को खुशियों से भर जायेंगे 

और उन्ही लम्हों को दोहराने में
इतने मग्न हो जायेंगे के 

प्यार में चलते चलते जाने कब 
इश्क़ में शहर हो जायेंगे 


No comments:

Post a Comment