Thursday, 20 April 2017

लघु कथा - उम्मीद

कई महीनों तक अनवरत काम करने के बाद आज प्रज्ञा ने काम से छुट्टी ली थी | यूँ तो घर पर रहना उसे  बिलकुल पसंद नहीं था पर रोहित के जाने के बाद उसने मजबूरन घर की इस उदसी को अपना सा लिया था । उसे याद है जब रोहित काम की वजह से महीनों घर नहीं लौटता था तो वो कैसे अपने अकेलेपन से भागने के लिये ओवरटाइम किया करती थी | ज़िन्दगी फिर भी हसीन थी, क्योंकि तब उसे रोहित के वापस आने की उम्मीद थी | हर रोज़ उठकर कैलेंडर पर एक-एक तारीख को काली स्याही से मार्क करना उसका फेवरेट काम था | फौज में रोहित था पर हर रोज़ अपनी तन्हाई से जद्दोजेहद प्रज्ञा करती थी| वो छुट्टी के दिन भी दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ घूमने निकल जाती थी, ताकि घर बैठकर रोहित को खो देने की चिंताओं से खुद को दूर कर सके |
दो साल हो चुके हैं उस बात को और प्रज्ञा ने अब उम्मीद खो दी है | वो अक्सर सोचती है के कैसे किसी एक इंसान के चले जाने से बाकी रिश्ते भी बेईमानी लगने लगते हैं | जब राह चलते वो जाने पहचाने किसी चेहरे से टकरा जाती है तो उनकी आँखों में खुद के लिए सहनुभुति देख कर वापस उसी खायी में गिर जाती है जिससे बाहर निकलने कि कोशिश वो हर रोज़ जी-जान से करती आ रही है । खुद को लोगों से दूर करने के लिए उसने बच्चों को ट्यूशन देना शुरू कर दिया था | कम से कम ये बच्चे उसकी आँखों की उदासी देख कर भी उसका कारण जानने की कोशिश तो नहीं करते थे |
पर महीनों काम करने से हुए थकान ने उसकी ये रफ़्तार तोड़ दी थी | खुद को उलझाने के लिए सुबह से घर के कामों में लगी प्रज्ञा अब थक कर ड्राइंग रूम में सोफ़े पर बैठ गयी थी | थकान की वजह से कब सोफ़े पर ही उसकी आँख लग गयी उसे पता ही नहीं चला | जब आँख खुली तो लाइट नहीं थी| अप्रैल का समय और अप्पार्टमेन्ट के बंद कमरे | वो झल्लाती हुई ड्राइंग रूम की खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गयी |
शाम हो चुकी थी | आसमान में दूर उसे गहरा लाल रंग दिखाई पड़ रहा था | चिड़ियों को वापस घर लौटते देखना, आस पास के छतों पर लोगों के ठहाके और अचानक उजाले में ही आसमान के एक कोने में निकल आया चाँद | ऐसी अनेक चीज़ों पर प्रज्ञा का ध्यान इतने दिनों से गया ही नहीं | अपने कौतुहल भरे जीवन में आये इस क्षण को प्रज्ञा जी लेना चाहती थी | वहीं लोहे के ग्रिल पर अपने सर को टिकाये वो अपने अपने घरों की छत पर गर्मी से बचते लोगों को देखने लगी | तभी उसका ध्यान सामने वाले घर के आँगन में गया |
"ये तो चीकू है, गुड़िया दीदी का बेटा | देखते देखते दो साल का हो गया |"
चीकू अपनी साइकिल पाइप लगाकर पानी से साफ़ कर रहा था | वो कभी साइकिल की सीट तो कभी हैंडल को मल मल कर साफ़ करता | साइकिल के चक्कों को साफ़ करने के लिए जब उसने साइकिल को लात मार कर उल्टा कर दिया तो उसकी इस सूझ-बुझ पर प्रज्ञा खुद को हसने से रोक नहीं पायी | साइकिल पानी से साफ़ करने के बाद चीकू चीख चीख कर अपनी माँ को आवाज़ देने लगा | तभी अंदर से गुड़िया दीदी आती दिखाई दीं, हाँथ में सूखा कपड़ा लिये | चीकू उनके हाथ से कपड़ा छीन कर अपनी साइकिल की सीट पोछने लगा | दो साल के चीकू की ये सारी समझदारी प्रज्ञा दूर से ही देख कर मुस्कुरा रही थी | जब बहुत देर तक आँगन में खेलने के बाद चीकू अंदर चला गया तो प्रज्ञा भी अपने नीरस जीवन में लौट आयी | वापस आसमान की ओर टकटकी लगा कर देखने लगी | तभी उसे एहसास हुआ के पिछले एक घंटे से वो एक टक चीकू के कारनामे देखे जा रही थी | इस दौरान एक पल के लिए भी उसके चेहरे से मुस्कराहट नहीं हटी | पर उससे भी ज़्यादा अनोखी बात ये के बीते एक घंटे में एक क्षण के लिए भी उसे रोहित की याद नहीं आयी | गुज़रे दो सालों में ये पहली दफा था के इतने लम्बे समय तक प्रज्ञा ने रोहित को मिस नहीं किया था |
कुछ देर और आसमान को निहारने के बाद प्रज्ञा बेचैन हो कर अंदर कमरे में आ गयी | वो तेज़ी से अपने बेड से लगे टेबल के पास आयी और उसपर रखी डायरी देखने लगी | शायद किसी का नंबर ढूंढ़ रही थी | पर डायरी में  नंबर नहीं मिलने से उसके चेहरे पर आया तनाव साफ़ नज़र आने लगा | उसे याद आया के जो नंबर वो ढूंढ़ रही है वो तो स्टोर रूम में पड़ी उसकी पुरानी फ़ोन डायरेक्टरी में होगा | रूम से भागती हुई वो स्टोर रूम में गयी तो इतना सारा कबाड़ देख कर सर पकड़ लिया | पर इस बार उसकी चाहत उसकी झल्लाहट को मात दे गयी |
कितने देर की मशक़्क़त के बाद उसे वो नंबर मिल ही गया | किसी तरह गिरते पड़ते, अपनी ख़ुशी को अपने हाव भाव पर हावी न होने देते हुए उसने वो नंबर मिलाया - " हेलो, किलकारी ओर्फनेज ?"
बहुत जतन के बाद प्रज्ञा ने अपनी खोयी उम्मीद पा ली थी  | 

Saturday, 25 March 2017

लघु कथा - मायका

सारे रिश्तेदारों के जाने के बाद घर में सन्नाटा सा फैल गया था । गर्म हवा दोपहर को बंद हो चुके खिड़की दरवाज़ों से टकरा कर डरावनी आवाज़ें पैदा कर रही थी । कामवाली भी घर की सफाई कर के जा चुकी थी । बहुत दिनों बाद आज घर में वापस ऐसी ख़ामोशी थी जो शांति नहीं बल्कि सन्नाटे के रूप में आयी थी । सन्नाटा, जिसमे कौतुहल था और बेचैनी भी । जो जा चुके किसी अपने को खो देने का एहसास भी करा रही थी और यादों की दौड़ में पीछे भागने को मज़बूर भी कर रही थी । बहुत देर तक रूही को सुलाने की कोशिश करने के बाद रचना भी थक कर बिस्तर पर लेट गयी थी । अपने कमरे के हर कोने को निहारती वो अपने बीते बचपन की यादों में डूबती जा रही थी । उसकी अलमारी, उसका टेबल, उसकी किताबें - सब वैसे ही रखे थे जैसा वो उन्हें छोड़ कर गयी थी ।
"माँ ने सब कुछ वैसे का वैसा रखा है, फिर भी अपनेपन का एहसास ग़ुम है।"
अचानक रचना की आँखें माँ के ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी । उस ड्रेसिंग टेबल से माँ को कितना लगाव था । वो याद करने लगी के कैसे माँ बहुत शान से बताती थी के ये ड्रेसिंग टेबल नाना ने उन्हें उनकी शादी में दिया था । कि कैसे वो अपने श्रृंगार का सारा सामान इस ड्रेसिंग टेबल के खानों में संजो कर रखती थी । और ये भी तो के बचपन में रचना ने इस ड्रेसिंग टेबल की वजह से कितनी मार खायी थी । वो याद करने लगी जब वो छोटी सी थी और माँ की नक़ल करते हुए उनकी चूड़ियां और मंगलसूत्र पहन कर सब्ज़ी लाने के लिए तैयार हो जाती थी । कैसे वो दोपहर होने का इंतज़ार करती, ताकि माँ की आँख लगते ही वो ड्रेसिंग टेबल के सामने अपना साज श्रृंगार कर सके । माँ के जागने के पहले सब ठीक भी तो करना होता था, वरना बहुत ज़ोर की मार पड़ती थी । उसके बाद उसकी जवानी का वो दौर जब वो घंटों ड्रेसिंग टेबल के सामने खुद को निहारा करती थी, बेशक पढाई में उसके कम नंबर यु हीं नहीं आते थे ।
ड्रेसिंग टेबल से हट कर उसका ध्यान जब अपनी चूड़ियों पर गया तो उसकी आँखें नम हो गयी । ये चूड़ियां तो माँ ने पिछले साल सावन में भिजवाई थी । वो सोचने लगी की इतने सालों से मैं मायके आने को तरसती रही, और आज जब यहाँ हूँ तो घर आने का एह्साह गायब है । शायद नानी ठीक ही कहती थीं, कि मायके घर से नहीं माँ से होता है ।
सोचते सोचते न जाने कब रचना की आँख लग गयी । कुछ देर बाद जब उठी तो रूही को अपने पास न पाकर इधर उधर ढूंढने लगी । नज़र घुमा कर देखा तो रूही ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी थी, होंठों पर लिपस्टिक लगाते हुए ।

Saturday, 9 April 2016

कोसी

राधा के बगल में आ कर बैठने से रौनक चौंक उठा । बहुत देर से वो कोसी नदी के किनारे बैठ पानी का शोर सुन रहा था । कभी मुस्कुराता तो कभी रोता, जाने वो नदी से क्या बातें कर रहा था । वो बार बार बहते पानी से अपने पैरों को धोने की कोशिश कर रहा था, पर नदी का बहाव इतना तेज़ था के हर बार रौनक को हार मन्नी पड़ रही थी । पर अचानक राधा के आ जाने से वो सजग हो गया, ये सोच कर के उसकी पत्नी जिसके आये हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ उसे बच्चों जैसी हरकते करता देख क्या सोचेगी । पर उसे समझ नहीं आ रहा था के राधा यहाँ कैसे आ गयी । इस जगह का तो उसने कभी ज़िक्र नहीं किया, फिर कैसे?
फिर उसे याद आया के वो अपनी डायरी तो गाड़ी में ही भूल आया था । पर राधा को बुरा न लगे इसलिए उसने कुछ भी पूछना ठीक नहीं समझा ।

रात का सन्नाटा इतना सुकून भरा था के रौनक और राधा चुप चाप तारों को निहार रहे थे । किसी को कहीं जाने की जल्दी नहीं थे, एकदूसरे को देने के लिए पूरी दुनिया का वक़्त था । राधा ने ही चुप्पी तोड़ी:

"आपको ये जगह बहुत पसंद है न? अपनी डायरी में आपने इस जगह का बार बार ज़िक्र किया है । माफ़ कीजियेगा पर मैंने आपकी डायरी पढ़ी, पर पूरी नहीं, टुकड़ों में । बस इतनी के इस जगह का पता चल सके । "

" कोई बात नहीं राधा । तुम न भी पढ़ती तो भी मैं तुम्हे सब बता देता । वैसे हाँ, इस जगह से मुझे काफी लगाव है । पसंद है या नहीं ये नहीं कह सकता । बचपन में यहीं खेलने आया करता था । मेरे घर के ठीक पीछे है ये जगह, इसलिए देर होने पर भी कोई डांटता नहीं था । मैं घंटों यहाँ बैठा करता था । पहले यहाँ बरगद का एक पेड़ भी हुआ करता था, बरहम बाबा कहते थे उन्हें । यहाँ मैं और मेरे दोस्त डोला पाती खेलते थे ।"

"ये कौन सा खेल है? "

" इसकी टहनियों पर हम दौड़ लगाते थे । कई बार गिरने से हाथ पैर में चोट भी लगी है । जब मैं रोने लगता था तो बाबूजी कहते थे के ये तो कुछ भी नहीं है, जब वो छोटे थे तो उनका हाथ टूट गया था । ये सुन कर बहुत बुरा लगत था, के मेरा हाथ क्यों नहीं टुटा । ज़रूर मैं ठीक से नहीं खेलता ।"

"और क्या यादें हैं?"

"इसी पेड़ की पूजा करने सारे गाँव से व्रतियां आती थी । नदी के पानी में पैर धोने से उनके आलते का रंग सीढ़ियों पर भी लग जाता था । फिर धीरे धीरे वो रंग सरकता हुआ कोसी में मिल जाता था, और देखते ही देखते गायब ! ये सब कुछ मुझे बहुत ही रोमांचित करता था। खेलना, तारे गिनना और व्रतियों को पूजा करते हुए देखना ।"

"इतनी सारी अच्छी यादें फिर भी बस लगाव है?"

"हाँ, बस लगाव है । पसंद नहीं ।"

"अजीब बात है! नापसंद करने वाली कौन सी बात है?"

"है बस"

"क्यों? मैं जानना चाहती हूँ"

" क्योंकि कोसी में जब बाढ़ आई थी तो सबसे पहले मेरा घर डूबा था । हमने दो दिन पहले ही घर छोड़ दिया था। कोसी बेलगाम हो चुकी थी, अपने पराये का भेद भूल चुकी थी । जिन खेतों को उसने सींचा था उन्ही खेतों को बर्बाद करने पर आतुर थी। मैं महज़ बारह साल का था । अपनों की आँखों में वो खौफ आज भी याद है मुझे । उस दिन के बाद हम कभी गाँव नहीं आये । बाबूजी ने शहर में ही किराए पर मकान ले लिया और मुझे पढाने लगे। उस बाढ़ ने मुझे आगे पढ़ने की प्रेरणा दी, या सच कहूं तो डराए रखा । उसी बाढ़ की वजह से तो मैं डैम इंजीनियर बना ।"

" पर इतना कुछ होने के बाद भी आप कोसी के लिए नहीं बदले "

"कैसे बदलूँ ? ज़रा देखो तो इसे, ये भी तो वैसी ही है - अल्हड़ , चंचल , मदमस्त, किसी के हाँथ ना आने वाली - कोसी ।"





Sunday, 3 April 2016

इश्क़ में शहर होना

जाने क्यों आज फ्लाईओवर से उतरते हुए बीता वक़्त याद  आ गया
के इसकी मरम्मति का ही वक़्त था
जब मैं तुमसे पहली बार मिली थी
उन बेतरतीब रास्तों पर चली, कीचड़ में सनी,
उस बारिश में मैं कितनी बार छीँकि थी 


अपनी दोस्ती के उस दौर में
हम कितना चला करते थे
एकांत भरी एक जगह के लिए
कितना वक़्त ज़ाया करते थे 


फिर गंगा घाट पे शामों को
जो चाए पिया करते थे
गांधी सेतु की जामों को
हम अंत तक जिया करते थे 


गांधी घाट के उस नाविक ने
जब हमें गंगा पार कराया था
गंगा नदी में सूरज को डूबता देख
जो सुकून हमने पाया था 


अशोक का इतिहास मुझे
तब ही याद हो पाया था
अगम कुआँ में झांकते वक़्त
जब तुमने मुझे गिरने से बचाया था 


हाई कोर्ट की ईमारत तुम्हे 
इतनी पसंद आती थी 
के विक्टोरिया आर्किटेक्चर के तुम्हारे किस्सों में
घड़ियाँ गुज़र जाती थीं 


बसंत विहार के डोसे की खुशबू
मेरे ज़हन में इस तरह उतर जाएगी
के आज भी डोसे के नाम से मुझे
तुम्हारी हिचकियाँ याद आएँगी 


बोरिंग रोड का वो कैफे
जहाँ हम दिन भर बैठा करते थे
जमुना अपर्टमेंट को देख कभी
अपने घर के सपने बुना करते थे 


उस वक़्त मैंने सोचा ही नहीं
कि एक दूसरे के प्यार में 

हम ऐसे कैद हो जायेंगे
के शहर के हर कोने को खुशियों से भर जायेंगे 

और उन्ही लम्हों को दोहराने में
इतने मग्न हो जायेंगे के 

प्यार में चलते चलते जाने कब 
इश्क़ में शहर हो जायेंगे 


Saturday, 27 February 2016

एक संडे की आत्मकथा

पता नहीं क्यों किसी किसी दिन वहीँ जाने का मन करता है जहाँ से आये थे । आज सुबह भी ऐसा ही हुआ । आँख खुलते ही जी चाहा की उस  दौर में पहुंच जाएँ जब संडे का मतलब 8 बजे तक सोना और देर से नाश्ता करना होता था । स्कूल से एक दिन कि छुट्टी गिफ्ट की तरह लगती थी। जब माँ के हाथ का बना संडे स्पेशल हम सब एक साथ कहते थे ।
संडे की दोपहर भी अजीब सी होती थी, हर दिन से अलग फिर भी एक सी । दोपहर को खाने के बाद सोना और जल्दी से शाम होने का इंतज़ार करना । फिर उन शामों को किसी के नाम कर देना या खुद किसी की शाम का हिस्सा बन जाना । कितना अच्छा लगता था जब ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल सारे लोग फुर्सत के पल निकल कर एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते थे ।
उसी साथ को साकार करने के लिए तो होता था शाम का नाश्ता ! संडे के दिन ही तो मैं और भाई मैगी से नाता तोड़ कर चाट और मोमोज़ से रिश्ता जोड़ते थे । भाई को मेरे हाथ की कोल्ड कॉफ़ी और मैकरोनी कितनी पसंद थी !

वो संडे ही तो होता था जब मैं और मिनी शाम के 5 बजने का बेसब्री से इंतज़ार करते थे । श्रीराम कुञ्ज की वो छत, उस छत का वो कोना जहाँ देर तक टहलने के बाद हम सुस्ताने के लिए बैठा करते थे और आस- पास के घरों तक पहुंचती हमारी तेज़ डरने वाली हँसी । उन शामों में होने वाली मेरी और मिनी की दुनियादारी की बातें और एक दूसरे को प्यार जताने के लिए बोले गए गालियों भरे वो शब्द ।
उसके बाद कितनी ही शामें दोस्तों के साथ टहलते हुए गुज़री हैं - पर न मिनी जैसा कोई साथी मिला न श्रीराम कुञ्ज की वो छत मिली । शायद मैंने ढूंढा भी नहीं या फिर मैं ढूंढना चाहती भी नहीं हूँ ।

बहुत कुछ बदल गया है मेरी ज़िन्दगी में । माँ के नाश्ते की जगह मेस का खाना है। पापा की डाँट की जगह प्रेजेंटेशन की तलवार है और बेपरवाह शामों की जगह लाइब्रेरी में गुज़ारा वक़्त है ।
और संडे? अब संडे और मंडे में तो कोई फर्क ही नहीं रहा ।
हो सकता है आज से 5 साल बाद मैं लाइब्रेरी को उसी तरह मिस करूँ जिस तरह श्रीराम कुञ्ज की छत को कर रही हूँ ।

पर ऐसा ही होता है शायद । अपनी ज़िन्दगी को आसान करने के लिए बदलती ज़िन्दगी के साथ लड़ने की जगह ज़िन्दगी के साथ बदल जाना ही आसान तरीका है । 

इज़हार

उस वक़्त मैंने कहाँ सोचा था की अनजाने में तुम्हारे साथ बिताया ये वक़्त , बेमन तुमसे की हुई ये बातें मुझे तुम्हारे करीब लाने का किस्मत का बहाना  है ।
मैंने कब जाना की राह चलते अचानक तुमसे टकरा जाना और उसके बाद घंटो तुमसे की हुई बातें इतनी कीमती हो जाएँगी की हर बार, बार बार, तुम्हारे और करीब होने के लिए मैं दिन में हज़ार बार उन्हें दोहराती रहूंगी ।
मुझे तो पता भी नहीं चला की कब तुम्हारे साथ वक़्त बिताने की ये आदत मेरी चाहत बन गयी ।

जाने कौन सी बात है तुममे की तुमसे दूर रहना मुझे बेचैन कर देता है । फिर जाने वो कौन सी बात है की तुम्हारे पास होकर भी मुझे चैन नहीं मिलता ।
मैं कायल हूँ तुम्हारी इस हँसी की । किसी बात पर तुम्हे दिल खोलकर हस्ते हुए देखना कितना सुखद एहसास है । दिल जीत लेने वाली तुम्हारी वो निश्छल, मंद मुस्कान तुम्हे और खूबसूरत बनती है ।

मैं परेशान हो जाती हूँ तुम्हरी सबको परेशान करने की आदत से । कई बार तुम्हारे कान खींचने का दिल करता है, की तुममे क्यों अभी भी बचपना है? तुम कब बड़े होगे ? पर सच कहूँ तो तुम्हारा ये बचपना भी मुझे पसंद है । मुझे परेशान देखकर तुम्हारा खुश होना भी मुझे ख़ुशी देता है ।

मैं जानती हूँ मैं तुमसे ये सब कह नहीं पाऊँगी । नाही तुम कभी समझ पाओगे । शायद प्यार में मिली हार ने मुझे कमज़ोर कर दिया है । मुझे डर लगता है तुम्हारे लिए अपने इन जज़्बातों से । मैं तुम्हारे लिए अपनी चाहत को और बढ़ने नहीं देना चाहती ।

किसी को यादों से निकाल पाना बहुत ही मुश्किल होता है । और खुद को एक बार फिर समेटने की हिम्मत नहीं है मुझमें । मैं तुम्हें ये कभी नहीं बताउंगी की तुमने चंद दिनों में मुझे कितनी यादें दी हैं । नहीं बताउंगी की तुम्हारी गैर-मौजूदगी मुझे किस हद तक परेशान कर देती है । तुम्हारा उदास चेहरा मुझे अंदर तक रुला देता है । तुम्हे हस्ता देखने के लिए मैं क्या कुछ कर सकती हूँ ।

तुम्हें कभी नहीं बताउंगी की मैं तुमसे किस कदर प्यार करती हूँ । मुझे टूट कर बिखर जाने से डर लगता है । 

Saturday, 13 February 2016

ग़ुलाब

"आज इतने सारे गुलाब क्यों ?"
"अरे शर्मा जी अपनी वाइफ के लिए ले रहे थे । तो मैंने भी ले लिए । वैसे आज कुछ है क्या?
"हाँ, आज वैलेंटाइन्स डे है । "
"अरे वाह, बहुत अपडेटेड रहने लगी हो आजकल"
"वो सब छोड़िये, कितने के लिए फूल पहले ये बताइये"
"क्यों? आज भी मुझसे लड़ोगी की मेहेंगे ले आया? "
"उसमे नयी बात क्या है? 25 साल हो गए साथ रहते पर आपको बार्गेनिंग नहीं आई । "
"या खुद हर बार की तरह गिफ्ट लेना भूल गयी इसलिए बात बदल रही हो ?"
"बताइये न कितने के लिए?"
"15 रूपए का एक । लो हार गया मैं, अब खुश?"
"ये कैसे ! मैं तो 30 रूपए का एक लेकर आई  ?"
"क्या? हाहाहा !!"
"हँस क्यों रहे हैं आप? मैं हार गयी इसलिए?"
"नहीं बेवकूफ, मैं हार गया इसलिए"