Wednesday, 6 January 2016

छूटता बंधन

"पता नहीं इस बार कश्मीरी आया होगा या नहीं । माँ ने अपनी शॉल तो मुझे दे दी थी । कितनी ज़िद्द कर के मैंने उन्हें ये शाल दिलाई थी । वो तो पापा से खुद बोलेंगी नहीं । भाई भी तो इतना लापरवाह है । खुद की सुध नहीं रहती उसे, माँ पापा का कैसे ख्याल रखता होगा"

कभी कभी सोचती हूँ तो यकीन नहीं होता के ये मैं ही हूँ, जो पिछले साल तक  सर्दियों में खुद ही बिना स्वेटर के घुमा करती थी -

"माँ तुम जानती हो मुझे उतनी ठण्ड नहीं लगती"

"माँ मैं उस स्वेटर में में बहुत बुरी दिखती हूँ, मैं ये नहीं पहनूंगी"

और अब अपने साथ साथ अपने घर वालों की भी ज़िम्मेदारी - जो किसी ने मुझे दी नहीं है पर बिना जताए मैं मेहसूस ज़रूर करने लगी हूँ ।

मुझे याद है जब मैं कॉलेज से घर पहुँचती थी और माँ घर पर नहीं होती थी तो कितना सुना लगता था । मैं हर जगह माँ को ढूँढ आती थी - छत पर, बालकनी  में,आस-पड़ोस में और दुकान पर भी । एक दिन मैंने माँ को साफ़ साफ़ कह दिया कि मेरे घर से निकलते और लौटते वक़्त तुम घर में रहोगी । पर ये नहीं कह पायी कि घर आने पर तुम नहीं दिखती तो बेचैनी होती है । तुम जाते वक़्त समय पर घर आने की हिदायत नहीं देती तो अधूरा लगता है ।

माँ की हिदायत का असर इतना होता था कि ज़रूरी काम होने पर और देर से आने की इजाज़त होने पर भी घर जाने की जल्दी रहती थी । माँ मुझे दरवाज़े पर देख कर कितना खुश होती थी । मैं जब भी माँ से पूछती हूँ की आप मेरे लिए ही इतनी परेशान क्यों होती हो तो जवाब बस इतना आता है की जब तुम्हारी बेटी होगी तब पता चलेगा !

पापा की एक बहुत बुरी आदत है जो मुझे बहुत अच्छी लगती है - वो है रोज़ सुबह मुझे उठाने की । हर रोज़ मेरी  नींद खुलती थी पापा के शोर करने से । सुबह के 7 बजे पापा चिल्ला रहे होते थे के आजकल के बच्चों का क्या रूटीन है, 12 बजे सोना है और12 बजे जागना है । और मेरे एक बार पापा बोलते ही पापा चुप हो जाते थे । इस बात पर माँ और भाई खूब हस्ते भी थे - के आपको बस आपकी बेटी ठीक कर सकती है । मैं भी ये सुनकर नींद में ही मुस्कुराने लगती थी । आज भी नींद खुलती है पापा के कॉल से । फ़ोन उठाते ही उनकी प्यारी सी आवाज़ में उठ जा बेटू सुनकर मेरी सुबह और सुहानी हो जाती है । पापा की इतनी छोटी छोटी दिल छू लेने वाली आदतें ही उन्हें और प्यारा इंसान बनती हैं । काश मैं उनकी तरह बन पाती !

पहली बार घर से बाहर आने का एहसास ऐसा ही होता होगा । आप छोटी छोटी गैरज़रूरी बातों और चीज़ों से भी रिश्ता जोड़ने लगते होंगे , हर बात में अपने वजूद को तलाशते होंगे और हर नए रिश्ते को अपनेपन के तराज़ू पर तौलते होंगे ।

सबकी ज़िन्दगी में ऐसा ही होता है शायद । अचानक जो रिश्ते आपके दिल के सबसे करीब होते हैं वो आपसे दूर जाने लगते हैं । दूरियों की वजह से रिश्ते और मज़बूत तो हो जाते हैं पर वो बंधन कमज़ोर होने लगता है । पहली बार आपको अपनों की ज़िम्मेदारी का एहसास तो होता है पर आप जानते हैं की एक सीमा से ज़्यादा आप अपनी ज़िम्मेदारी निभा नहीं सकते । यही वो वक़्त होता है जब आपके अनुभव बस आपके होते हैं - कोई साथी कोई संगी नहीं होता उन्हें साझा करने के लिए । शायद यही वो वक़्त होता है जब हम असल मायने में बड़े हो रहे होते हैं ।

बदलते दौर, बदलते वक़्त और बदलते लोगों बीच आप खुद को बदलने और न बदलने के सवाल से रूबरू होते हैं - पर जवाब देना तब आसान हो जाता है जब आपके पास कुछ कभी न बदलने वाली चीज़ों का साथ हो - जैसे पापा की कॉल और माँ की हिदायत ।