पता नहीं क्यों किसी किसी दिन वहीँ जाने का मन करता है जहाँ से आये थे । आज सुबह भी ऐसा ही हुआ । आँख खुलते ही जी चाहा की उस दौर में पहुंच जाएँ जब संडे का मतलब 8 बजे तक सोना और देर से नाश्ता करना होता था । स्कूल से एक दिन कि छुट्टी गिफ्ट की तरह लगती थी। जब माँ के हाथ का बना संडे स्पेशल हम सब एक साथ कहते थे ।
संडे की दोपहर भी अजीब सी होती थी, हर दिन से अलग फिर भी एक सी । दोपहर को खाने के बाद सोना और जल्दी से शाम होने का इंतज़ार करना । फिर उन शामों को किसी के नाम कर देना या खुद किसी की शाम का हिस्सा बन जाना । कितना अच्छा लगता था जब ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल सारे लोग फुर्सत के पल निकल कर एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते थे ।
उसी साथ को साकार करने के लिए तो होता था शाम का नाश्ता ! संडे के दिन ही तो मैं और भाई मैगी से नाता तोड़ कर चाट और मोमोज़ से रिश्ता जोड़ते थे । भाई को मेरे हाथ की कोल्ड कॉफ़ी और मैकरोनी कितनी पसंद थी !
वो संडे ही तो होता था जब मैं और मिनी शाम के 5 बजने का बेसब्री से इंतज़ार करते थे । श्रीराम कुञ्ज की वो छत, उस छत का वो कोना जहाँ देर तक टहलने के बाद हम सुस्ताने के लिए बैठा करते थे और आस- पास के घरों तक पहुंचती हमारी तेज़ डरने वाली हँसी । उन शामों में होने वाली मेरी और मिनी की दुनियादारी की बातें और एक दूसरे को प्यार जताने के लिए बोले गए गालियों भरे वो शब्द ।
उसके बाद कितनी ही शामें दोस्तों के साथ टहलते हुए गुज़री हैं - पर न मिनी जैसा कोई साथी मिला न श्रीराम कुञ्ज की वो छत मिली । शायद मैंने ढूंढा भी नहीं या फिर मैं ढूंढना चाहती भी नहीं हूँ ।
बहुत कुछ बदल गया है मेरी ज़िन्दगी में । माँ के नाश्ते की जगह मेस का खाना है। पापा की डाँट की जगह प्रेजेंटेशन की तलवार है और बेपरवाह शामों की जगह लाइब्रेरी में गुज़ारा वक़्त है ।
और संडे? अब संडे और मंडे में तो कोई फर्क ही नहीं रहा ।
हो सकता है आज से 5 साल बाद मैं लाइब्रेरी को उसी तरह मिस करूँ जिस तरह श्रीराम कुञ्ज की छत को कर रही हूँ ।
पर ऐसा ही होता है शायद । अपनी ज़िन्दगी को आसान करने के लिए बदलती ज़िन्दगी के साथ लड़ने की जगह ज़िन्दगी के साथ बदल जाना ही आसान तरीका है ।
संडे की दोपहर भी अजीब सी होती थी, हर दिन से अलग फिर भी एक सी । दोपहर को खाने के बाद सोना और जल्दी से शाम होने का इंतज़ार करना । फिर उन शामों को किसी के नाम कर देना या खुद किसी की शाम का हिस्सा बन जाना । कितना अच्छा लगता था जब ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल सारे लोग फुर्सत के पल निकल कर एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते थे ।
उसी साथ को साकार करने के लिए तो होता था शाम का नाश्ता ! संडे के दिन ही तो मैं और भाई मैगी से नाता तोड़ कर चाट और मोमोज़ से रिश्ता जोड़ते थे । भाई को मेरे हाथ की कोल्ड कॉफ़ी और मैकरोनी कितनी पसंद थी !
वो संडे ही तो होता था जब मैं और मिनी शाम के 5 बजने का बेसब्री से इंतज़ार करते थे । श्रीराम कुञ्ज की वो छत, उस छत का वो कोना जहाँ देर तक टहलने के बाद हम सुस्ताने के लिए बैठा करते थे और आस- पास के घरों तक पहुंचती हमारी तेज़ डरने वाली हँसी । उन शामों में होने वाली मेरी और मिनी की दुनियादारी की बातें और एक दूसरे को प्यार जताने के लिए बोले गए गालियों भरे वो शब्द ।
उसके बाद कितनी ही शामें दोस्तों के साथ टहलते हुए गुज़री हैं - पर न मिनी जैसा कोई साथी मिला न श्रीराम कुञ्ज की वो छत मिली । शायद मैंने ढूंढा भी नहीं या फिर मैं ढूंढना चाहती भी नहीं हूँ ।
बहुत कुछ बदल गया है मेरी ज़िन्दगी में । माँ के नाश्ते की जगह मेस का खाना है। पापा की डाँट की जगह प्रेजेंटेशन की तलवार है और बेपरवाह शामों की जगह लाइब्रेरी में गुज़ारा वक़्त है ।
और संडे? अब संडे और मंडे में तो कोई फर्क ही नहीं रहा ।
हो सकता है आज से 5 साल बाद मैं लाइब्रेरी को उसी तरह मिस करूँ जिस तरह श्रीराम कुञ्ज की छत को कर रही हूँ ।
पर ऐसा ही होता है शायद । अपनी ज़िन्दगी को आसान करने के लिए बदलती ज़िन्दगी के साथ लड़ने की जगह ज़िन्दगी के साथ बदल जाना ही आसान तरीका है ।