Tuesday, 5 May 2015

याद हो तुम

याद आता है मुझे
बचपन का वो ज़माना
जब तुम्हे छुप छुप कर देखना ही था
मेरे जीने का बहाना

याद आता है मुझे
तुम्हारी गलियों में गुज़ारा हर वक़्त, हर लम्हा
तुम्हे बस एक बार देखने की ख़्वाहिश
फिर लौट आना युही खाली हाथ, नाउम्मीद और तन्हा

याद आता है मुझे
तुम्हे स्कूल तक छोड़ने जाना
पिछली सीट पर बैठ कर तुम्हे देखना
और तुम्हारे मुड़ते ही मेरा सेहम जाना

याद आता है मुझे
गुलाबी रंग का तुम्हारा कढ़ाईदार सूट
रेशम के धागों से बुनी तम्हारी गुलाबी चादर
जो कर रही थी मेरी कायनात को मेहफ़ूज़

याद आता है मुझे
मंदिर में घंटों तुम्हारा इंतज़ार करना
मुझे देख मुस्कुराना तुम्हारा
और तुम्हे देख मेरी धड़कनों का तेज़ हो जाना

याद आता है मुझे
तुम्हारा मोहल्ले की शादियों में जाना
मेरा तुम्हारा पीछा करना
और तुम्हारा मुझे देख कर भी अनदेखा कर जाना

याद आता है मुझे
मेरा तुम्हे इज़हार करना और तुम्हारा इंकार कर जाना
मेरा बार बार कोशिश करना
और तुम्हारा हर बार मुकर जाना

याद आता है मुझे
तुम्हारी आँखों से बरसता वो नूर
मुझे आखिरी बार पलट कर देखना तुम्हारा
और कर देना खुद से दूर

आज भी याद हो तुम
तुम्हारे दबे होंठ और झुकी नज़रों का शर्माना,
मुझसे दूर हो कर भी तुम्हारा हर वक़्त मेरे ख्यालों में होना,
और मेरे बुरे वक़्त में भी मुझे जीना सीखा जाना


Saturday, 2 May 2015

मेरा गाँव, मेरा देस

मुझे याद है मेरे गाँव की वो सड़के
जो कभी बन न पायी थी आज़ादी के कई  साल बाद भी
नेशनल हाईवे का वो संकरा मोड़
जहां चलते चलते पहुंच जाती हूँ मैं आज भी

मेरे गाँव की वो नहर जो बहती होगी आज भी
उसके किनारे के वो पेड़ क्या घने होंगे आज भी?
वो पोखर भी वही होगा जहां पापा मछलियाँ पकड़ते थे
वो स्कूल भी तो होगा जहां पढ़ने जाया करते थे

मेरे खेतों पर जाती वो कच्ची पगडंडियां
जो गवाह बनी मेरे बचपन की
हरे मटर और चने के वो खेत
जहां जम कर की है चोरी भी

मेरे घर का वो आँगन, वो देवता घर, वो दालान
जिसके हर कोने में बसी है मेरी कोई न कोई याद
मेरे घर की वो रसोई, वो मिटटी का चूल्हा, उसपे बने पकवान की खुशबू,
जो खीच लेती है आज भी मुझे, कर देती है आने पर मजबूर

मेरे छत का वो कोना जहाँ से होलिका की लपटें दिखती थी
पूर्णिमा की उस रात को चाँदनी क्या खूब बिखरती थी

दालमोट की वो दूकान जो आज भी होगी चौराहे पर
जो ले आते थे बड़े पापा किसी के भूख लग जाने पर

कितनी रातें , कितने वादे कितनी बातें इसकी याद हैं
मैं चलती तो कहीं और हूँ पर दीखता मेरा गाँव है