Saturday, 9 April 2016

कोसी

राधा के बगल में आ कर बैठने से रौनक चौंक उठा । बहुत देर से वो कोसी नदी के किनारे बैठ पानी का शोर सुन रहा था । कभी मुस्कुराता तो कभी रोता, जाने वो नदी से क्या बातें कर रहा था । वो बार बार बहते पानी से अपने पैरों को धोने की कोशिश कर रहा था, पर नदी का बहाव इतना तेज़ था के हर बार रौनक को हार मन्नी पड़ रही थी । पर अचानक राधा के आ जाने से वो सजग हो गया, ये सोच कर के उसकी पत्नी जिसके आये हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ उसे बच्चों जैसी हरकते करता देख क्या सोचेगी । पर उसे समझ नहीं आ रहा था के राधा यहाँ कैसे आ गयी । इस जगह का तो उसने कभी ज़िक्र नहीं किया, फिर कैसे?
फिर उसे याद आया के वो अपनी डायरी तो गाड़ी में ही भूल आया था । पर राधा को बुरा न लगे इसलिए उसने कुछ भी पूछना ठीक नहीं समझा ।

रात का सन्नाटा इतना सुकून भरा था के रौनक और राधा चुप चाप तारों को निहार रहे थे । किसी को कहीं जाने की जल्दी नहीं थे, एकदूसरे को देने के लिए पूरी दुनिया का वक़्त था । राधा ने ही चुप्पी तोड़ी:

"आपको ये जगह बहुत पसंद है न? अपनी डायरी में आपने इस जगह का बार बार ज़िक्र किया है । माफ़ कीजियेगा पर मैंने आपकी डायरी पढ़ी, पर पूरी नहीं, टुकड़ों में । बस इतनी के इस जगह का पता चल सके । "

" कोई बात नहीं राधा । तुम न भी पढ़ती तो भी मैं तुम्हे सब बता देता । वैसे हाँ, इस जगह से मुझे काफी लगाव है । पसंद है या नहीं ये नहीं कह सकता । बचपन में यहीं खेलने आया करता था । मेरे घर के ठीक पीछे है ये जगह, इसलिए देर होने पर भी कोई डांटता नहीं था । मैं घंटों यहाँ बैठा करता था । पहले यहाँ बरगद का एक पेड़ भी हुआ करता था, बरहम बाबा कहते थे उन्हें । यहाँ मैं और मेरे दोस्त डोला पाती खेलते थे ।"

"ये कौन सा खेल है? "

" इसकी टहनियों पर हम दौड़ लगाते थे । कई बार गिरने से हाथ पैर में चोट भी लगी है । जब मैं रोने लगता था तो बाबूजी कहते थे के ये तो कुछ भी नहीं है, जब वो छोटे थे तो उनका हाथ टूट गया था । ये सुन कर बहुत बुरा लगत था, के मेरा हाथ क्यों नहीं टुटा । ज़रूर मैं ठीक से नहीं खेलता ।"

"और क्या यादें हैं?"

"इसी पेड़ की पूजा करने सारे गाँव से व्रतियां आती थी । नदी के पानी में पैर धोने से उनके आलते का रंग सीढ़ियों पर भी लग जाता था । फिर धीरे धीरे वो रंग सरकता हुआ कोसी में मिल जाता था, और देखते ही देखते गायब ! ये सब कुछ मुझे बहुत ही रोमांचित करता था। खेलना, तारे गिनना और व्रतियों को पूजा करते हुए देखना ।"

"इतनी सारी अच्छी यादें फिर भी बस लगाव है?"

"हाँ, बस लगाव है । पसंद नहीं ।"

"अजीब बात है! नापसंद करने वाली कौन सी बात है?"

"है बस"

"क्यों? मैं जानना चाहती हूँ"

" क्योंकि कोसी में जब बाढ़ आई थी तो सबसे पहले मेरा घर डूबा था । हमने दो दिन पहले ही घर छोड़ दिया था। कोसी बेलगाम हो चुकी थी, अपने पराये का भेद भूल चुकी थी । जिन खेतों को उसने सींचा था उन्ही खेतों को बर्बाद करने पर आतुर थी। मैं महज़ बारह साल का था । अपनों की आँखों में वो खौफ आज भी याद है मुझे । उस दिन के बाद हम कभी गाँव नहीं आये । बाबूजी ने शहर में ही किराए पर मकान ले लिया और मुझे पढाने लगे। उस बाढ़ ने मुझे आगे पढ़ने की प्रेरणा दी, या सच कहूं तो डराए रखा । उसी बाढ़ की वजह से तो मैं डैम इंजीनियर बना ।"

" पर इतना कुछ होने के बाद भी आप कोसी के लिए नहीं बदले "

"कैसे बदलूँ ? ज़रा देखो तो इसे, ये भी तो वैसी ही है - अल्हड़ , चंचल , मदमस्त, किसी के हाँथ ना आने वाली - कोसी ।"





1 comment:

  1. This is so simple and so beautiful!!we dont always need a omplicated topic or complicated writing,sometimes the beauty of simplicity cn give goosebumps,,i literally imagined ur words..great work babe

    ReplyDelete