Saturday, 25 March 2017

लघु कथा - मायका

सारे रिश्तेदारों के जाने के बाद घर में सन्नाटा सा फैल गया था । गर्म हवा दोपहर को बंद हो चुके खिड़की दरवाज़ों से टकरा कर डरावनी आवाज़ें पैदा कर रही थी । कामवाली भी घर की सफाई कर के जा चुकी थी । बहुत दिनों बाद आज घर में वापस ऐसी ख़ामोशी थी जो शांति नहीं बल्कि सन्नाटे के रूप में आयी थी । सन्नाटा, जिसमे कौतुहल था और बेचैनी भी । जो जा चुके किसी अपने को खो देने का एहसास भी करा रही थी और यादों की दौड़ में पीछे भागने को मज़बूर भी कर रही थी । बहुत देर तक रूही को सुलाने की कोशिश करने के बाद रचना भी थक कर बिस्तर पर लेट गयी थी । अपने कमरे के हर कोने को निहारती वो अपने बीते बचपन की यादों में डूबती जा रही थी । उसकी अलमारी, उसका टेबल, उसकी किताबें - सब वैसे ही रखे थे जैसा वो उन्हें छोड़ कर गयी थी ।
"माँ ने सब कुछ वैसे का वैसा रखा है, फिर भी अपनेपन का एहसास ग़ुम है।"
अचानक रचना की आँखें माँ के ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी । उस ड्रेसिंग टेबल से माँ को कितना लगाव था । वो याद करने लगी के कैसे माँ बहुत शान से बताती थी के ये ड्रेसिंग टेबल नाना ने उन्हें उनकी शादी में दिया था । कि कैसे वो अपने श्रृंगार का सारा सामान इस ड्रेसिंग टेबल के खानों में संजो कर रखती थी । और ये भी तो के बचपन में रचना ने इस ड्रेसिंग टेबल की वजह से कितनी मार खायी थी । वो याद करने लगी जब वो छोटी सी थी और माँ की नक़ल करते हुए उनकी चूड़ियां और मंगलसूत्र पहन कर सब्ज़ी लाने के लिए तैयार हो जाती थी । कैसे वो दोपहर होने का इंतज़ार करती, ताकि माँ की आँख लगते ही वो ड्रेसिंग टेबल के सामने अपना साज श्रृंगार कर सके । माँ के जागने के पहले सब ठीक भी तो करना होता था, वरना बहुत ज़ोर की मार पड़ती थी । उसके बाद उसकी जवानी का वो दौर जब वो घंटों ड्रेसिंग टेबल के सामने खुद को निहारा करती थी, बेशक पढाई में उसके कम नंबर यु हीं नहीं आते थे ।
ड्रेसिंग टेबल से हट कर उसका ध्यान जब अपनी चूड़ियों पर गया तो उसकी आँखें नम हो गयी । ये चूड़ियां तो माँ ने पिछले साल सावन में भिजवाई थी । वो सोचने लगी की इतने सालों से मैं मायके आने को तरसती रही, और आज जब यहाँ हूँ तो घर आने का एह्साह गायब है । शायद नानी ठीक ही कहती थीं, कि मायके घर से नहीं माँ से होता है ।
सोचते सोचते न जाने कब रचना की आँख लग गयी । कुछ देर बाद जब उठी तो रूही को अपने पास न पाकर इधर उधर ढूंढने लगी । नज़र घुमा कर देखा तो रूही ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी थी, होंठों पर लिपस्टिक लगाते हुए ।

2 comments:

  1. It is so beautiful.Last wali line gave me goosebumps!Portrayed beautifully.

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  2. This one is so beautiful! Every lines in the first para reflect maturity. Lots of beautiful literary elements are there. Last line, your strength, as always!! Keep it up. :)

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