Sunday, 2 August 2015

सावन

एक मोटी सी बूँद जब पड़ी मेरे गालों पर
मन झूम उठा फिर बीते पलों की यादों पर
जब दुनियादारी की बातों से बेसुध थे हम
अपने सपनो की दुनिया में गुमसुम थे हम

याद आया मुझे कैसे चहक सी जाती थी मैं
छू लेते थे जब हाथ मेरा, कैसे सहम सी जाती थी मैं
जब अपनी उंगलियां फेरते थे मेरे बालों में तुम
पास बैठ तुम्हारे यूँ हो जाती थी ख्यालों में ग़ुम

वो बिंदी मेरी जहा दिल था तुम्हारी सल्तनत का
वो काजल मेरा जहां चैन था तुम्हारी रातों का
वो नज़रे तुम्हारी जो छू लेती थी मेरे तन को
वो आँखें तुम्हारी जो पढ़ लेती थी मेरे मन को

फिर अचानक आँख खुली तो सोचा ये क्या सोच रही हूँ मैं
जो हो न सका मेरा उसकी क्यों हो रही हूँ मैं
दर्द देते हैं बस क्यों बैठ गयी ऐसी बातों को लेकर
कुछ देर बाद याद आया, सावन आ गया है
बीती यादों को लेकर...

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