Saturday, 2 May 2015

मेरा गाँव, मेरा देस

मुझे याद है मेरे गाँव की वो सड़के
जो कभी बन न पायी थी आज़ादी के कई  साल बाद भी
नेशनल हाईवे का वो संकरा मोड़
जहां चलते चलते पहुंच जाती हूँ मैं आज भी

मेरे गाँव की वो नहर जो बहती होगी आज भी
उसके किनारे के वो पेड़ क्या घने होंगे आज भी?
वो पोखर भी वही होगा जहां पापा मछलियाँ पकड़ते थे
वो स्कूल भी तो होगा जहां पढ़ने जाया करते थे

मेरे खेतों पर जाती वो कच्ची पगडंडियां
जो गवाह बनी मेरे बचपन की
हरे मटर और चने के वो खेत
जहां जम कर की है चोरी भी

मेरे घर का वो आँगन, वो देवता घर, वो दालान
जिसके हर कोने में बसी है मेरी कोई न कोई याद
मेरे घर की वो रसोई, वो मिटटी का चूल्हा, उसपे बने पकवान की खुशबू,
जो खीच लेती है आज भी मुझे, कर देती है आने पर मजबूर

मेरे छत का वो कोना जहाँ से होलिका की लपटें दिखती थी
पूर्णिमा की उस रात को चाँदनी क्या खूब बिखरती थी

दालमोट की वो दूकान जो आज भी होगी चौराहे पर
जो ले आते थे बड़े पापा किसी के भूख लग जाने पर

कितनी रातें , कितने वादे कितनी बातें इसकी याद हैं
मैं चलती तो कहीं और हूँ पर दीखता मेरा गाँव है 

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